Premanand Ji Maharaj Ki Ye Seekh Ganth Bandh Lein Kahin Ye Galtiyan Aapka Jeevan Vyarth Na Kar Dein
जानिए प्रेमानंद जी महाराज की सीख और ऐसी गलतियों के बारे में, जो जीवन को व्यर्थ कर सकती हैं। जानें बुरी संगति, गलत आदतों से बचने और नाम-जप का महत्व।
भवानी अष्टकम एक दिव्य और शक्तिशाली स्तोत्र है जिसे आदि शंकराचार्य ने रचा था। इसे पढ़ने से माँ काली की कृपा प्राप्त होती है और यह कारागार या मृत्यु दंड जैसी विपत्तियों से भी मुक्ति दिला सकता है।
हमारे प्राचीन शास्त्रों में ऐसी बहुत सी बातें बताई गई हैं जिनसे हम अनजान है। भवान्यष्टकम् भी ऐसी ही एक रचना है। इसका निर्माण आदि शंकराचार्य द्वारा किया गया था। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार इसके जप से मां भगवती आद्यशक्ति प्रसन्न होती हैं और साधक की कामनाएं पूर्ण करती हैं। वैदिक परंपरा में भी जब कोई ऐसा संकट आ जाए जिसका समाधान न हो तो इसका प्रयोग किया जाता है। कोई व्यक्ति कारागार में है या मृत्युदंड की सजा पा चुका है तो वह भी इसके प्रयोग से मुक्त हो सकता है।
न तातो न माता न बन्धुर्न दाता न पुत्रो न पुत्री न भृत्यो न भर्ता।
न जाया न विद्या न वृत्तिर्ममैव गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥1॥
भवाब्धावपारे महादुःखभीरुः पपात प्रकामी प्रलोभी प्रमत्तः।
कुसंसार-पाश-प्रबद्धः सदाऽहं गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥2॥
न जानामि दानं न च ध्यान-योगं न जानामि तंत्र न च स्तोत्र-मन्त्रम्।
न जानामि पूजां न च न्यासयोगं गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥3॥
न जानामि पुण्यं न जानानि तीर्थं न जानामि मुक्तिं लयं वा कदाचित्।
न जानामि भक्ति व्रतं वाऽपि मात-र्गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥4॥
कुकर्मी कुसंगी कुबुद्धि कुदासः कुलाचारहीनः कदाचारलीनः।
कुदृष्टिः कुवाक्यप्रबंधः सदाऽह गतिस्त्व गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥5॥
प्रजेशं रमेशं महेशं सुरेशं दिनेशं निशीथेश्वरं वा कदाचित्।
न जानामि चाऽन्यत् सदाऽहं शरण्ये गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥6॥
विवादे विषादे प्रमादे प्रवासे जले चाऽनले पर्वते शत्रुमध्ये।
अरण्ये शरण्ये सदा मां प्रपाहि गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥7॥
अनाथो दरिद्रो जरा-रोगयुक्तो महाक्षीणदीनः सदा जाड्यवक्त्रः।
विपत्तौ प्रविष्टः प्रणष्टः सदाऽहं गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥8॥
॥ इति श्रीमच्छशंकराचार्यकृतं भवान्यष्टकं संपूर्णम् ॥
भवानी अष्टकम एक संस्कृत स्तोत्र है जो आदि शंकराचार्य द्वारा रचित है। इसमें देवी दुर्गा से शरणागति की याचना की जाती है। यह स्तोत्र आठ श्लोकों में रचा गया है और हर श्लोक में माँ भवानी को एकमात्र गति बताया गया है।
भवानी अष्टकम का पाठ प्रातःकाल या संध्या के समय करना श्रेष्ठ माना गया है। विशेष रूप से अमावस्या, नवरात्रि, और चंद्रग्रहण जैसे पवित्र दिनों में इसका पाठ अत्यधिक फलदायी होता है।
हां, धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यदि कोई व्यक्ति सच्ची श्रद्धा और विश्वास से भवानी अष्टकम का पाठ करता है तो वह कठिनतम संकटों से भी मुक्त हो सकता है, जैसे कारावास या मृत्यु दंड।
आप भवानी अष्टकम का सरल हिंदी अनुवाद विकिपीडिया, संस्कृत शाला, और Green Message जैसी वेबसाइट्स पर पढ़ सकते हैं। कई YouTube चैनल्स पर इसका भावार्थ सहित पाठ भी उपलब्ध है।
'गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि' भवानी अष्टकम का प्रमुख भाव है जो हर श्लोक में दोहराया गया है। इसका अर्थ है – "हे भवानी! तुम ही मेरी एकमात्र गति हो।"
जी हां, भवानी अष्टकम का पाठ करने से व्यक्ति के भीतर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और उसे भय, चिंता, और मानसिक तनाव से मुक्ति मिलती है।
जानिए प्रेमानंद जी महाराज की सीख और ऐसी गलतियों के बारे में, जो जीवन को व्यर्थ कर सकती हैं। जानें बुरी संगति, गलत आदतों से बचने और नाम-जप का महत्व।
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