नवरात्रि के चौथे दिन माँ कूष्मांडा की पूजा क्यों होती है? जानें मंत्र, कथा और भोग
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नवरात्रि के चौथे दिन माँ कूष्मांडा की पूजा क्यों होती है? जानें मंत्र, कथा और भोग

नवरात्रि के चौथे दिन माँ कूष्मांडा की पूजा विधि, पावन कथा, बीज मंत्र, स्तोत्र, कवच और भोग के बारे में जानें। माँ की आराधना का महत्व पढ़ें।

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नवरात्रि के चौथे दिन की कथा: माँ कूष्मांडा पूजा विधि, बीज मंत्र, स्तोत्र, कवच एवं भोग

नवरात्रि के चौथे दिन माँ कूष्मांडा की पूजा की जाती है। इस लेख में जानिए Navratri Day 4 Katha, माँ कूष्मांडा की पूजा विधि, मंत्र, स्तोत्र पाठ, कवच और भोग से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी।

माँ दुर्गा के चौथे स्वरूप का नाम कूष्माण्डा है। अपनी मन्द हंसी से अण्ड अर्थात ब्रह्माण्ड को उत्पन्न करने के कारंण इन्हें कूष्माण्डा देवी के नाम से जाना जाता है। संस्कृत भाषा में कूष्माण्ड कूम्हडे को कहा जाता है, कूम्हडे की बलि इन्हें प्रिय है, इस कारण से भी इन्हें कूष्माण्डा के नाम से जाना जाता है। जब सृष्टि नहीं थी और चारों ओर अंधकार ही अंधकार था तब इन्होंने ईषत हास्य से ब्रह्माण्ड की रचना की थी। यह सृष्टि की आदिस्वरूपा हैं और आदिशक्ति भी। इनका निवास सूर्य मंडल के भीतर के लोक में है।

सूर्यलोक में निवास करने की क्षमता और शक्ति केवल इन्हीं में है। नवरात्रि के चौथे दिन कूष्माण्डा देवी के स्वरूप की पूजा की जाती है। साधक इस दिन अनाहत चक्र में अवस्थित होता है। अतः इस दिन पवित्र मन से माँ के स्वरूप को ध्यान में रखकर पूजन करना चाहिए।

माँ कूष्माण्डा देवी की पूजा से भक्त के सभी रोग नष्ट हो जाते हैं। माँ की भक्ति से आयु, यश, बल और स्वास्थ्य की वृद्धि होती है। इनकी आठ भुजायें हैं इसीलिए इन्हें अष्टभुजा कहा जाता है। इनके सात हाथों में कमण्डल, धनुष, बाण, कमल पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र तथा गदा है। आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जपमाला है। कूष्माण्डा देवी अल्पसेवा और अल्पभक्ति से ही प्रसन्न हो जाती हैं। यदि साधक सच्चे मन से इनका शरणागत बन जाये तो उसे अत्यन्त सुगमता से परम पद की प्राप्ति हो जाती है।

नवरात्रि के चौथे दिन माँ कूष्मांडा का मंत्र

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

माँ कूष्मांडा ध्यान मंत्र

वन्दे वांछित कामर्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
सिंहरूढ़ा अष्टभुजा कूष्माण्डा यशस्वनीम्॥

भास्वर भानु निभां अनाहत स्थितां चतुर्थ दुर्गा त्रिनेत्राम्।
कमण्डलु, चाप, बाण, पदमसुधाकलश, चक्र, गदा, जपवटीधराम्॥

पटाम्बर परिधानां कमनीयां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल, मण्डिताम्॥

प्रफुल्ल वदनांचारू चिबुकां कांत कपोलां तुंग कुचाम्।
कोमलांगी स्मेरमुखी श्रीकंटि निम्ननाभि नितम्बनीम्॥

माँ कूष्मांडा स्तोत्र पाठ

दुर्गतिनाशिनी त्वंहि दरिद्रादि विनाशनीम्।
जयंदा धनदा कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥

जगतमाता जगतकत्री जगदाधार रूपणीम्।
चराचरेश्वरी कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥

त्रैलोक्यसुन्दरी त्वंहिदुःख शोक निवारिणीम्।
परमानन्दमयी, कूष्माण्डे प्रणमाभ्यहम्॥

माँ कूष्मांडा कवच पाठ

हंसरै में शिर पातु कूष्माण्डे भवनाशिनीम्।
हसलकरीं नेत्रेच, हसरौश्च ललाटकम्॥

कौमारी पातु सर्वगात्रे, वाराही उत्तरे तथा,
पूर्वे पातु वैष्णवी इन्द्राणी दक्षिणे मम।

दिगिव्दिक्षु सर्वत्रेव कूं बीजं सर्वदावतु॥

माँ कूष्मांडा बीज मंत्र:-

ऐं ह्री देव्यै नम:

माँ कूष्मांडा बीज मंत्र जाप विधि: माँ कुष्मांडा के बीज मंत्रो का जाप एक माला अर्थात 108 बार करे। माँ के बीज मंत्रो का जाप करने से आप जीवन मे हमेशा उन्नति की ओर अग्रसर होते है।

नवरात्रि के चौथे दिन माँ कूष्मांडा का भोग (Navratri Prasadam)

माँ कूष्मांडा को मालपुए का भोग लगाएं। इसके बाद प्रसाद को ब्राह्मण को दान करें और स्वयं भी ग्रहण करें। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ऐसा करने से बुद्धि का विकास होता है और निर्णय लेने की क्षमता बेहतर होती है।

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