karwa chauth pujan and thali
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Purusha Suktam in Hindi and Sanskrit with complete lyrics, Hindi meaning, benefits, पूजा विधि और Sanskrit PDF. पढ़ें पुरुष सूक्तम् का संपूर्ण पाठ।
॥ पुरुषसूक्तम् ॥
ॐ सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्।
स भूमिं सर्वतः स्पृत्वाऽत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्॥ १ ॥
पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भाव्यम्।
उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति॥ २ ॥
एतावानस्य महिमातो ज्यायाँश्च पुरुषः।
पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि॥ ३ ॥
त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत्पुनः।
ततो विष्वङ् व्यक्रामत्साशनानशने अभि॥ ४ ॥
ततो विराडजायत विराजो अधि पुरुषः।
स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुरः॥ ५ ॥
तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः सम्भृतं पृषदाज्यम्।
पशूंस्ताँश्चक्रे वायव्यानारण्यान् ग्राम्याश्च ये॥ ६ ॥
तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे।
छन्दाँसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत॥ ७ ॥
तस्मादश्वा अजायन्त ये के चोभयादतः।
गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाता अजावयः॥ ८ ॥
तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन् पुरुषं जातमग्रतः।
तेन देवा अयजन्त साध्या ऋषयश्च ये॥ ९ ॥
यत्पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन्।
मुखं किमस्यासीत् किं बाहू किमूरू पादा उच्येते॥ १० ॥
ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्बाहू राजन्यः कृतः।
ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत॥ ११ ॥
चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत।
श्रोत्राद्वायुश्च प्राणश्च मुखादग्निरजायत॥ १२ ॥
नाभ्या आसीदन्तरिक्षं शीर्ष्णो द्यौः समवर्तत।
पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकाँ अकल्पयन्॥ १३ ॥
यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत्।
वसन्तोऽस्यासीदाज्यं ग्रीष्म इध्मः शरद्धविः॥ १४ ॥
सप्तास्यासन् परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कृताः।
देवा यज्ञं तन्वाना अबध्नन् पुरुषं पशुम्॥ १५ ॥
यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्।
ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः॥ १६ ॥
॥ पुरुषसूक्तं सम्पूर्णम् ॥
पुरुष सूक्तम् (Purusha Suktam) वेदों का एक अत्यंत महत्वपूर्ण सूक्त है, जिसमें विराट पुरुष अर्थात परम पुरुष के स्वरूप और संपूर्ण सृष्टि में उनकी व्यापकता का वर्णन किया गया है। पुरुष सूक्तम् मुख्य रूप से भगवान नारायण/विष्णु के विराट स्वरूप से जोड़ा जाता है। इसमें परमात्मा को ऐसे विराट पुरुष के रूप में बताया गया है, जिनसे समस्त सृष्टि का विस्तार हुआ और जिनमें संपूर्ण ब्रह्मांड व्याप्त है।
पुरुष सूक्तम् ऋग्वेद के दशम मंडल के 90वें सूक्त (ऋग्वेद 10.90) के रूप में प्रसिद्ध है। इसके मंत्रों में परम पुरुष के हजारों सिर, हजारों नेत्र और हजारों चरणों का प्रतीकात्मक वर्णन मिलता है। इसका अर्थ यह है कि परमात्मा की उपस्थिति केवल किसी एक स्थान या रूप तक सीमित नहीं है, बल्कि वे संपूर्ण संसार में व्याप्त हैं।
इस सूक्त में सृष्टि की उत्पत्ति और उसके विभिन्न तत्वों का भी वर्णन मिलता है। इसमें बताया गया है कि विराट पुरुष से विभिन्न लोक, देवता, प्रकृति के तत्व तथा सामाजिक व्यवस्थाओं का प्राकट्य हुआ। इसी कारण पुरुष सूक्तम् को केवल भगवान की स्तुति का मंत्र न मानकर सृष्टि और परमात्मा के संबंध को समझाने वाला महत्वपूर्ण वैदिक सूक्त भी माना जाता है।
धार्मिक परंपरा में पुरुष सूक्तम् का पाठ पूजा, यज्ञ, धार्मिक अनुष्ठान और वैदिक साधना में किया जाता है। अनेक श्रद्धालु इसका पाठ भगवान विष्णु या नारायण की आराधना के रूप में करते हैं। परंपरागत मान्यता के अनुसार, श्रद्धा और विधिपूर्वक पुरुष सूक्तम् का पाठ करने से मन में शांति, सकारात्मकता और आध्यात्मिक एकाग्रता प्राप्त करने में सहायता मिलती है। हालांकि इसके आध्यात्मिक लाभों को धार्मिक मान्यताओं के संदर्भ में समझना चाहिए।
इस पृष्ठ पर आपको पुरुष सूक्तम् का संपूर्ण संस्कृत पाठ, हिंदी में इसका अर्थ, पुरुष सूक्तम् के महत्व और पारंपरिक रूप से बताए जाने वाले लाभ मिलेंगे। साथ ही, आप Purusha Suktam in Sanskrit, Purusha Suktam in Hindi और Purusha Suktam PDF भी प्राप्त कर सकते हैं।
यदि आप पुरुष सूक्तम् का पाठ करना चाहते हैं, तो मंत्रों का उच्चारण ध्यानपूर्वक करना और उनके अर्थ को समझकर श्रद्धा के साथ पाठ करना उपयोगी माना जाता है। पुरुष सूक्तम् हमें यह संदेश देता है कि संपूर्ण सृष्टि में एक ही परम चेतना का विस्तार है और प्रत्येक जीव तथा प्रकृति उसी विराट सत्ता का हिस्सा है।
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