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पितृ दोष निवारण के उपाए, कैसे पता लगाए पितृ दोष है या नहीं एवं कैसे प्रसन्न करे पित्रो को पुर्वजों का अपमान करने से भी पितृ दोष व्यक्ति की कुंडली मे बनता है...
सूर्य नमस्कार: 12 मंत्र, विधि, सूर्य प्रणाम और महत्व जानें। सूर्य के 12 नामों के साथ सूर्य नमस्कार करने की पारंपरिक विधि, सूर्य प्रणाम मंत्र, अर्घ्य और धार्मिक महत्व पढ़ें।
हिंदू धर्म में सूर्यदेव को जीवन, प्रकाश और ऊर्जा का आधार माना गया है। प्रतिदिन सूर्य को नमस्कार करना और उनकी उपासना करना प्राचीन धार्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। सूर्य नमस्कार, सूर्य प्रणाम और सूर्य पूजा के माध्यम से भगवान सूर्य के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त की जाती है।
सूर्य नमस्कार को केवल शारीरिक अभ्यास के रूप में ही नहीं, बल्कि ध्यान, अनुशासन और आध्यात्मिक साधना से जुड़ी परंपरा के रूप में भी देखा जाता है। विशेष रूप से सूर्य के बारह नामों का स्मरण करते हुए बारह साष्टांग प्रणाम करने की विधि का धार्मिक महत्व बताया गया है।
इस लेख में सूर्य नमस्कार की पारंपरिक विधि, सूर्य नमस्कार के 12 मंत्र, सूर्य प्रणाम, सूर्यदेव को अर्घ्य देने की विधि, अरुण को अर्घ्य तथा सूर्यपादोदक से संबंधित मंत्रों के बारे में विस्तार से जानेंगे।
सूर्य नमस्कार अर्थात भगवान सूर्य को श्रद्धापूर्वक नमस्कार करना। पारंपरिक धार्मिक संदर्भ में सूर्य के बारह नामों का स्मरण करते हुए बारह प्रणाम करने की विधि बताई गई है। प्रत्येक नाम के उच्चारण के साथ एक साष्टांग प्रणाम किया जाता है।
सूर्य नमस्कार में शरीर की गतिविधि के साथ मन को सूर्यदेव के ध्यान में लगाने पर भी जोर दिया जाता है। इसी कारण इसे सूर्य प्रणाम और सूर्य उपासना से जुड़ी साधना के रूप में भी समझा जाता है।
आधुनिक योग में Surya Namaskar या Sun Salutation को विभिन्न शारीरिक मुद्राओं और आसनों के क्रम के रूप में भी किया जाता है। इसलिए पारंपरिक सूर्य प्रणाम और आधुनिक Surya Namaskar Yoga के संदर्भ को समझना आवश्यक है।
हिंदू परंपरा में सूर्यदेव के अनेक नाम बताए गए हैं। इनमें से बारह नामों का स्मरण करते हुए बारह नमस्कार करने की परंपरा विशेष रूप से प्रसिद्ध है।
सूर्य के प्रत्येक नाम के साथ एक प्रणाम किया जाता है। इस प्रकार बारह नामों के साथ कुल बारह साष्टांग प्रणाम पूरे होते हैं। यह साधना भक्तिभाव, ध्यान और अनुशासन के साथ करने की परंपरा है।
साष्टांग प्रणाम में शरीर को भूमि पर झुकाकर भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव व्यक्त किया जाता है। सूर्य नमस्कार में यही प्रणाम सूर्यदेव के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता का प्रतीक माना जाता है।
सूर्य नमस्कार या सूर्य प्रणाम शुरू करने से पहले मन को शांत रखना चाहिए। परंपरागत विधि में पहले संकल्प किया जाता है और भगवान सूर्य को अर्घ्य अर्पित किया जाता है।
सूर्यमंडल में स्थित भगवान नारायण का ध्यान करने की भी परंपरा है। साधक को भगवान के दिव्य स्वरूप का ध्यान करते हुए श्रद्धा और समर्पण का भाव रखना चाहिए।
सूर्य नमस्कार करते समय जल्दबाजी करने के बजाय प्रत्येक मंत्र और प्रणाम को श्रद्धा से करना उचित माना जाता है।
सूर्य के बारह नमस्कार शुरू करने से पहले संकल्प किया जाता है—
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः अद्य....अहं श्रीपरमात्म-प्रित्यर्थमादित्यस्य द्वादशनमस्काराख्यं कर्म करिष्ये।
संकल्प के बाद अंजलि में या तांबे के पात्र में लाल चंदन, अक्षत और पुष्प लेकर हाथों को हृदय के पास लाकर सूर्यदेव को अर्घ्य देने की परंपरा है।
सूर्यदेव को अर्घ्य देते समय श्रद्धा के साथ जल अर्पित किया जाता है। इसके लिए तांबे के पात्र का प्रयोग करने की परंपरा भी प्रचलित है।
अर्घ्य देते समय निम्न मंत्र का उच्चारण किया जाता है—
एहि सूर्य सहस्त्रांशो तेजोराशे जगत्पते।
अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणार्घ्यं दिवाकर॥
इसके बाद सूर्यमंडल में स्थित भगवान नारायण का ध्यान किया जाता है।
सूर्य नमस्कार की पारंपरिक विधि में भगवान नारायण के ध्यान का भी उल्लेख मिलता है। ध्यान करते समय भगवान के दिव्य स्वरूप का मन में स्मरण किया जाता है।
ध्येय: सदा सवितृमण्डलमध्यवर्ती।
नारायणः सरसिजासनसन्निविष्टः।
केयूरवान् मकरकुण्डलवान् किरीटी
हारी हिरण्मयवपुर्धृतशङ्खचक्रः॥
ध्यान के बाद सूर्यदेव के बारह नामों का स्मरण करते हुए साष्टांग प्रणाम किया जाता है।
सूर्य के इन बारह नाम-मंत्रों को Surya Namaskar Mantra, Sun Salutation Mantra और Surya Pranam Mantra के रूप में भी जाना जाता है। प्रत्येक मंत्र के साथ एक प्रणाम किया जाता है।
पहले सूर्य नमस्कार में भगवान सूर्य के मित्र स्वरूप का स्मरण करते हुए इस मंत्र का उच्चारण किया जाता है।
ॐ मित्राय नमः।
दूसरे नमस्कार में भगवान सूर्य के रवि स्वरूप का स्मरण किया जाता है।
ॐ रवये नमः।
तीसरे नमस्कार में सूर्यदेव को उनके सूर्य स्वरूप में प्रणाम किया जाता है।
ॐ सूर्याय नमः।
चौथे नमस्कार में भगवान सूर्य के प्रकाशमान स्वरूप का स्मरण किया जाता है।
ॐ भानवे नमः।
पांचवें नमस्कार में सूर्यदेव के खग स्वरूप का स्मरण किया जाता है।
ॐ खगाय नमः।
छठे नमस्कार में भगवान सूर्य के पूषा स्वरूप का स्मरण किया जाता है।
ॐ पूष्णे नमः।
सातवें नमस्कार में हिरण्यगर्भ स्वरूप सूर्यदेव का स्मरण किया जाता है।
ॐ हिरण्यगर्भाय नमः।
आठवें नमस्कार में भगवान सूर्य के मरीचि स्वरूप का स्मरण किया जाता है।
ॐ मरीचये नमः।
नौवें नमस्कार में सूर्यदेव के आदित्य स्वरूप का स्मरण किया जाता है।
ॐ आदित्याय नमः।
दसवें नमस्कार में भगवान सूर्य के सविता स्वरूप का स्मरण किया जाता है।
ॐ सवित्रे नमः।
ग्यारहवें नमस्कार में सूर्यदेव के अर्क स्वरूप को प्रणाम किया जाता है।
ॐ अर्काय नमः।
बारहवें और अंतिम नमस्कार में भगवान सूर्य के भास्कर स्वरूप को प्रणाम किया जाता है।
ॐ भास्कराय नमो नमः।
इस प्रकार सूर्य के बारह नामों का स्मरण करते हुए बारह साष्टांग प्रणाम पूरे किए जाते हैं।
सूर्य के बारह नमस्कार की पारंपरिक विधि में एक मंत्र के उच्चारण के साथ एक साष्टांग प्रणाम किया जाता है।
सबसे पहले सूर्यदेव के पहले नाम का उच्चारण करके प्रणाम करें। फिर उठकर दूसरे नाम का उच्चारण करते हुए दूसरा प्रणाम करें। इसी प्रकार क्रमशः सूर्य के सभी बारह नामों का स्मरण करते हुए बारह प्रणाम किए जाते हैं।
इस दौरान मन को शांत रखना चाहिए और भगवान सूर्य के दिव्य स्वरूप का ध्यान करना चाहिए। सूर्य नमस्कार को केवल जल्दी-जल्दी पूरा करने के बजाय श्रद्धा और एकाग्रता के साथ करना इस साधना का महत्वपूर्ण भाव है।
Surya Namaskar को अंग्रेजी में Sun Salutation कहा जाता है। आधुनिक योग परंपरा में Sun Salutation शारीरिक आसनों का एक क्रम है, जिसमें शरीर की विभिन्न स्थितियों के माध्यम से अभ्यास किया जाता है।
वहीं पारंपरिक सूर्य प्रणाम की धार्मिक विधि में सूर्यदेव के बारह नामों का स्मरण और साष्टांग प्रणाम प्रमुख है।
इसलिए Surya Namaskar Yoga और पारंपरिक सूर्य नमस्कार के बीच संबंध होने के बावजूद दोनों को उनके अलग-अलग संदर्भों में समझना उचित है।
108 संख्या का हिंदू धर्म और भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में विशेष महत्व माना जाता है। इसी कारण कई साधक विशेष अवसरों पर 108 सूर्य नमस्कार करने का संकल्प लेते हैं।
108 Surya Namaskar को साधना, अनुशासन और संकल्प से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि इतने अधिक नमस्कार करने से पहले अपनी शारीरिक क्षमता का ध्यान रखना आवश्यक है।
यदि इसे योग अभ्यास के रूप में किया जा रहा हो, तो शरीर पर अनावश्यक दबाव डालने के बजाय धीरे-धीरे अभ्यास बढ़ाना चाहिए।
बारह सूर्य नमस्कार पूरे करने के बाद सूर्यदेव के सारथी अरुण को अर्घ्य देने की परंपरा बताई गई है।
इस अवसर पर निम्न मंत्र का उच्चारण किया जाता है—
विनतातनयो देवः कर्मसाक्षी सुरेश्वरः।
सप्ताश्वः सप्तरज्जुश्च अरुणो मे प्रसीदतु॥
ॐ कर्मसाक्षिणे अरुणाय नमः।
इसके बाद सूर्य नमस्कार की महिमा से संबंधित निम्न मंत्र का पाठ किया जाता है—
आदित्यस्य नमस्कारं ये कुर्वन्ति दिने दिने।
जन्मान्तरसहस्रेषु दारिद्र्यं नोपजायते॥
सूर्यदेव को अर्पित जल को मस्तक और आंखों पर लगाने तथा चरणामृत के रूप में ग्रहण करने की परंपरा भी बताई गई है।
इस समय निम्न मंत्र का उच्चारण किया जाता है—
अकालमृत्युहरणं सर्वव्याधिविनाशनम्।
सूर्यपादोदकं तीर्थं जठरे धारयाम्यहम्॥
इसके बाद कर्म को भगवान को समर्पित करने के भाव से कहा जाता है—
ॐ तत्सत् कृतमिदं कर्म ब्रह्मार्पणमस्तु।
विष्णवे नमः। विष्णवे नमः।
ब्रह्मार्पणमस्तु।
इस प्रकार सूर्य नमस्कार की पारंपरिक विधि में मंत्र, ध्यान, अर्घ्य, प्रणाम और समर्पण का भाव एक साथ जुड़ जाता है।
सूर्य नमस्कार या सूर्य प्रणाम करते समय कुछ सामान्य बातों का ध्यान रखना चाहिए।
सूर्य नमस्कार के बारह मंत्र इस प्रकार हैं—
इन बारह मंत्रों के साथ सूर्यदेव को बारह प्रणाम करने की परंपरा सूर्य प्रणाम की महत्वपूर्ण साधना मानी जाती है।
सूर्यदेव को भारतीय परंपरा में प्रकाश, जीवन और ऊर्जा का आधार माना गया है। इसलिए सूर्य की उपासना में केवल बाहरी पूजा ही नहीं, बल्कि मन में कृतज्ञता और श्रद्धा का भाव भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
सूर्य नमस्कार के दौरान बारह नामों का स्मरण साधक को सूर्यदेव के विभिन्न स्वरूपों का ध्यान करने का अवसर देता है। साष्टांग प्रणाम समर्पण का भाव प्रकट करता है और ध्यान मन को एकाग्र करने में सहायता करता है।
इसी कारण सूर्य नमस्कार को सूर्य पूजा, सूर्य प्रणाम और योग के बीच एक सुंदर सेतु के रूप में भी देखा जा सकता है।
सूर्य नमस्कार भारतीय परंपरा में शरीर, मन और श्रद्धा को एक साथ जोड़ने वाली साधना के रूप में देखा जाता है। सूर्य के बारह नामों का स्मरण करते हुए बारह साष्टांग प्रणाम करना इस परंपरा का विशेष हिस्सा है।
Surya Namaskar Mantra, Surya Pranam Mantra और Sun Salutation Mantra के रूप में प्रसिद्ध ये बारह मंत्र भगवान सूर्य के विभिन्न नामों का स्मरण कराते हैं। इनके साथ किया गया सूर्य प्रणाम साधक के मन में श्रद्धा, अनुशासन और समर्पण का भाव उत्पन्न करता है।
यदि सूर्य नमस्कार को नियमित रूप से किया जाए, तो इसे केवल एक अभ्यास के रूप में नहीं बल्कि सूर्यदेव के प्रति कृतज्ञता और भारतीय आध्यात्मिक परंपरा से जुड़ने के माध्यम के रूप में भी समझा जा सकता है।
ॐ सूर्य देवाय नमः।
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