जानिए माँ कालरात्रि की पूजा में क्या है खास? मंत्र, कवच और भोग का महत्व
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जानिए माँ कालरात्रि की पूजा में क्या है खास? मंत्र, कवच और भोग का महत्व

माँ कालरात्रि की पूजा विधि, बीज मंत्र, ध्यान, स्तोत्र, कवच और भोग जानें। नवरात्रि के सातवें दिन माँ कालरात्रि की पूजा का महत्व पढ़ें।

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दुर्गा की सातवीं शक्ति माँ कालरात्रि के नाम से जानी जाती है। इनके शरीर का रंग घने अंधकार की भाँति काला है। इनके बाल बिखरे हुए हैं और गले में विद्युत की भाँति चमकने वाली माला सुशोभित है। इनके तीन नेत्र हैं, जो ब्रह्माण्ड की तरह गोल हैं और जिनमें से बिजली की तरह चमकीली किरणें निकलती रहती हैं। इनकी नासिका से श्वास और निःश्वास के साथ अग्नि की भयंकर ज्वालाएँ निकलती रहती हैं। इनका वाहन गर्दभ (गधा) है। दाहिने ऊपर का हाथ वरद मुद्रा में है, जिससे माता सभी को वरदान देती हैं, जबकि दाहिना नीचे वाला हाथ अभय मुद्रा में है। बायीं ओर के ऊपर वाले हाथ में लोहे का काँटा और निचले हाथ में खड्ग सुशोभित है।

माँ का यह स्वरूप देखने में अत्यन्त भयानक है, किन्तु सदैव शुभ फलदायक है। अतः भक्तों को इनसे भयभीत नहीं होना चाहिए। दुर्गा पूजा के सातवें दिन माँ कालरात्रि की उपासना का विधान है। इस दिन साधक का मन सहस्रार चक्र में अवस्थित होता है। साधक के लिए सभी सिद्धियों का द्वार खुलने लगता है। इस चक्र में स्थित साधक का मन पूर्णतः माँ कालरात्रि के स्वरूप में अवस्थित रहता है। उनके साक्षात्कार से मिलने वाले पुण्य का वह अधिकारी होता है। उसकी समस्त विघ्न-बाधाओं और पापों का नाश हो जाता है तथा उसे अक्षय पुण्य लोक की प्राप्ति होती है।

भगवती कालरात्रि का ध्यान, कवच और स्तोत्र का जाप करने से भानुचक्र जागृत होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इनकी कृपा से अग्नि भय, आकाश भय, भूत-पिशाच आदि का भय स्मरण मात्र से दूर हो जाता है। माँ कालरात्रि अपने भक्तों को अभय प्रदान करती हैं।

माँ कालरात्रि मंत्र

या देवी सर्वभूतेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।

एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी।।

वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा।
वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी।।

माँ कालरात्रि ध्यान मंत्र

करालवन्दना घोरां मुक्तकेशी चतुर्भुजाम्।
कालरात्रिं करालिंका दिव्यां विद्युत्माला विभूषिताम्॥

दिव्यं लौहवज्रखड्ग वामोर्ध्वकराम्बुजाम्।
अभयं वरदां चैव दक्षिणोर्ध्वाघः पाणिकाम् मम॥

महामेघप्रभां श्यामां तक्षा चैव गर्दभारूढ़ा।
घोरदंश्ट्राकरालास्यां पीनोन्नत पयोधराम्॥

सुखप्रसन्नवदना स्मेरान्न सरोरुहाम्।
एवं सञ्चिन्तयेत् कालरात्रिं सर्वकामसमृद्धिदाम्॥

माँ कालरात्रि स्तोत्र

हीं कालरात्रि श्री कराली च क्लीं कल्याणी कलावती।
कालमाता कलिदर्पध्नी कमदीश कृपान्विता॥

कामबीजजपानन्दा कामबीजस्वरूपिणी।
कुमतिघ्नी कुलीनार्तिनाशिनी कुलकामिनी॥

क्लीं हीं श्रीं मन्त्रवर्णेन कालकण्टकघातिनी।
कृपामयी कृपाधारा कृपापारा कृपागमा॥

माँ कालरात्रि कवच

ॐ क्लीं मे हृदयं पातु पादौ श्रीकालरात्रि।
ललाटे सततं पातु तुष्टग्रह निवारिणी॥

रसनां पातु कौमारी, भैरवी चक्षुषोर्भवम्।
कटौ पृष्ठे महेशानी, कर्णौ शंकरभामिनी॥

वर्जितानि तु स्थानानि यानि च कवचेन हि।
तानि सर्वाणि मे देवी सततं पातु स्तम्भिनी॥

माँ कालरात्रि बीज मंत्र

क्लीं ऐं श्री कालिकायै नमः।

बीज मंत्र का जाप एक माला अर्थात 108 बार करें। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माँ कालरात्रि के बीज मंत्र का जाप करने से व्यक्ति भयमुक्त होता है और दुर्घटनाओं से रक्षा की कामना करता है। भक्त माता की कृपा से समाज में यश एवं सम्मान प्राप्त करने तथा उन्नति की ओर अग्रसर होने की प्रार्थना करते हैं।

माँ कालरात्रि भोग

माँ कालरात्रि को गुड़ का भोग अर्पित किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, गुड़ का भोग लगाकर उसे ब्राह्मण को दान करने से सभी शोकों से मुक्ति मिलती है और अचानक आने वाले संकटों से रक्षा होती है। भक्त नवरात्रि के सातवें दिन श्रद्धापूर्वक माँ कालरात्रि को गुड़ अर्पित करके अपने परिवार की सुख-शांति और कल्याण की प्रार्थना करते हैं।

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